SC ने नाबालिग रेप विक्टिम के अबॉर्शन का आदेश पलटा: पेरेंट्स ने कहा- बेटी की जिंदगी खतरे में पड़ सकती है, हम बच्चे को पालेंगे

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नई दिल्ली22 मिनट पहले

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22 अप्रैल की सुनवाई में कोर्ट ने कहा था कि हम अबॉर्शन की इजाजत इसलिए दे रहे हैं, क्योंकि यह असाधारण मामला है। हर घंटा विक्टिम के लिए अहम है। - Dainik Bhaskar

22 अप्रैल की सुनवाई में कोर्ट ने कहा था कि हम अबॉर्शन की इजाजत इसलिए दे रहे हैं, क्योंकि यह असाधारण मामला है। हर घंटा विक्टिम के लिए अहम है।

सुप्रीम कोर्ट ने 14 साल की रेप विक्टिम को 30 हफ्ते की प्रेग्नेंसी में अबॉर्शन की इजाजत देने वाला फैसला पलट दिया है। कोर्ट ने 22 अप्रैल को लड़की के अबॉर्शन की इजाजत दी थी।

कोर्ट ने ये फैसला लड़की के माता-पिता के अनुरोध के बाद पलटा। लड़की के पेरेंट्स ने कहा कि इस प्रोसिजर से उनकी बेटी की जिंदगी को खतरा हो सकता है। उन्होंने ये भी कहा कि हम बच्चे को पालने के लिए तैयार हैं।

पेरेंट्स से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बात करने के बाद CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि बच्चे का हित सबसे ऊपर है।

22 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल के आधार पर दिया था फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने 22 अप्रैल को मुंबई के लोकमान्य तिलक अस्पताल को तत्काल अबॉर्शन के लिए इंतजाम करने का आदेश दिया था। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ने आदेश सुनाते हुए कहा था- हम अबॉर्शन की इजाजत इसलिए दे रहे हैं, क्योंकि यह असाधारण मामला है। हर घंटा विक्टिम के लिए अहम है।

बेंच ने मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा था कि प्रेग्नेंसी जारी रखने से विक्टिम की मेंटल और फिजिकल हेल्थ पर असर पड़ेगा। हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अबॉर्शन कराने में थोड़ा रिस्क तो है, लेकिन प्रेग्नेंसी जारी रखने में और भी बड़ा रिस्क है।

बच्ची की मां ने पहले बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी
नाबालिग की मां ने पहले बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। 4 अप्रैल को बॉम्बे हाईकोर्ट ने नाबालिग को अबॉर्शन की इजाजत नहीं दी। इसके बाद लड़की की मां ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली थी। सुप्रीम कोर्ट ने 19 अप्रैल को मामले में सुनवाई की और हाईकोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए नाबालिग का मेडिकल चेकअप कराने का आदेश दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड से राय मांगी थी
इस मामले में IPC की धारा 376 और POCSO एक्ट में केस दर्ज है। CJI चंद्रचूड़ की बेंच ने 19 अप्रैल की सुनवाई में कहा था कि यौन उत्पीड़न को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने जिस मेडिकल रिपोर्ट पर भरोसा किया, वह नाबालिग पीड़ित की शारीरिक और मानसिक कंडीशन का आकलन करने में विफल रही है।

इस सुनवाई में बेंच ने निर्देश दिया था कि महाराष्ट्र सरकार याचिकाकर्ता और उसकी नाबालिग बेटी को सेफ्टी के साथ अस्पताल ले जाना तय करे। जांच के लिए गठित मेडिकल बोर्ड इस बात पर भी राय दे कि क्या नाबालिग के जीवन को खतरे में डाले बिना अबॉर्शन किया जा सकता है। यही मेडिकल रिपोर्ट आज कोर्ट में पेश की गई, जिसके आधार पर फैसला सुनाया गया।

प्रेग्नेंसी अबॉर्शन का नियम क्या कहता है
मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट के तहत, किसी भी शादीशुदा महिला, रेप विक्टिम, दिव्यांग महिला और नाबालिग लड़की को 24 हफ्ते तक की प्रेग्नेंसी अबॉर्ट करने की इजाजत दी जाती है। 24 हफ्ते से ज्यादा प्रेग्नेंसी होने पर मेडिकल बोर्ड की सलाह पर कोर्ट से अबॉर्शन की इजाजत लेनी पड़ती है। MTP एक्ट में बदलाव साल 2020 में किया गया था। उससे पहले 1971 में बना कानून लागू होता था।

अक्टूबर 2023 में कोर्ट ने 26 हफ्ते की प्रेग्नेंट शादीशुदा महिला को अबॉर्शन की इजाजत नहीं दी थी
पिछले साल 16 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने 26 हफ्ते 5 दिन की प्रेग्नेंट विवाहित महिला की अबॉर्शन की अपील खारिज कर दी थी। CJI डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस बी वी नागरत्ना की बेंच ने तर्क दिया था कि प्रेग्नेंसी टर्मिनेशन की 24 हफ्तों की समय सीमा खत्म हो चुकी है। ऐसे में महिला को अबॉर्शन की इजाजत नहीं दे सकते।

मामले की सुनवाई के दौरान महिला के वकील कॉलिन गोन्जाल्विस ने तर्क दिया था कि यह एक्सीडेंटल और अनप्लान्ड प्रेग्नेंसी थी। महिला को नहीं लगता है कि वह अगले तीन महीने तक इस प्रेग्नेंसी को जारी रख सकती है। ये उसके अधिकारों का हनन है।

इस पर बेंच ने कहा- महिला 26 हफ्ते और 5 दिन की प्रेग्नेंट है। AIIMS की रिपोर्ट के मुताबिक, कोख में पल रहा भ्रूण पूरी तरह स्वस्थ है। मां को भी कोई खतरा नहीं है। AIIMS महिला की डिलीवरी करे और सरकार इसका खर्च उठाए। बच्चे के जन्म के बाद मां-बाप फैसला करें कि वो उसे पालना चाहते हैं या अडॉप्शन के लिए देंगे। इसमें सरकार उनकी मदद करेगी। पूरी खबर यहां पढ़ें…

जनवरी 2024 में हाईकोर्ट ने 29 हफ्ते की प्रेग्नेंट विधवा को अबॉर्शन की इजाजत दी थी, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला पलटा
इस साल 5 जनवरी को दिल्ली हाईकोर्ट ने मानसिक बीमारी से जूझ रही 29 हफ्ते की प्रेग्नेंट विधवा को अबॉर्शन की इजाजत दी थी। कोर्ट ने कहा- प्रेग्नेंसी जारी रखने से महिला की मेंटल हेल्थ पर बुरा असर पड़ सकता है। रिप्रोडक्शन चॉइस राइट में बच्चे को जन्म न देने का अधिकार भी शामिल है।

हाईकोर्ट ने कहा- महिला ने 19 अक्टूबर 2023 को अपने पति को खो दिया और 31 अक्टूबर 2023 को पता चला कि वो प्रेग्नेंट है। जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद कहा कि महिला के मैरिटल स्टेटस बदल गया है।एम्स की मेंटल हेल्थ स्टेटस रिपोर्ट में पता चला है कि महिला अपने पति की मौत की वजह से मानसिक तौर पर परेशान है।

हालांकि, महिला की मेडिकल रिपोर्ट देखने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने 23 जनवरी को अपना फैसला खुद ही पलट दिया। कोर्ट ने कहा कि भ्रूण पूरी तरह स्वस्थ है। ऐसे में प्रेग्नेंसी को टर्मिनेट करना न्यायसंगत नहीं होगा।

इसके बाद महिला ने दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। मामले की सुनवाई 1 फरवरी को हुई, तब तक महिला 32 हफ्ते की प्रेग्नेंट हो चुकी थी। कोर्ट ने भी मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देते हुए महिला को अबॉर्शन की इजाजत नहीं दी थी।

कोर्ट ने कहा कि बच्चा एकदम स्वस्थ्य है। हम ऐसे मामलों को एंटरटेन नहीं कर सकते हैं। महिला के लिए सिर्फ एक-दो हफ्ते की बात और है। अगर महिला बच्चे को अडॉप्शन के लिए देना चाहे तो सरकार बच्चे को गोद लेने को तैयार है।