एलन मस्क के पिता को स्पर्म डोनेट करने का ऑफर: भारतीयों को चाहिए लंबा-गोरा बच्चा, कपल्स करते हैं यूरोप-रूस-जॉर्जिया के डोनर की डिमांड

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नई दिल्ली3 घंटे पहलेलेखक: ऐश्वर्या शर्मा

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दुनिया के सबसे अमीर आदमी एलन मस्क के पिता एरोल मस्क इन दिनों खूब चर्चा में हैं। कुछ दिन पहले उन्होंने सौतेली बेटी से दूसरा बच्चा होने की बात का खुलासा किया था। हाल ही में उन्होंने दावा किया कि एक स्पर्म बैंक ने उन्हें स्पर्म डोनेट करने के लिए संपर्क किया।

कंपनी चाहती है कि हाई-क्लास कोलंबियाई महिलाओं को गर्भवती करने के लिए स्पर्म डोनेट करें ताकि एलन मस्क जैसा बच्चा पैदा हो। विदेशों में मन मुताबिक बच्चा पैदा होना बहुत आम बात है लेकिन अब हमारे देश में भी कपल्स ऐसा चाहते हैं।

आज वर्ल्ड आईवीएफ डे है। जब कपल बच्चे की चाहत में आईवीएफ क्लीनिक जाते हैं तो कई तरह की डिमांड डॉक्टर के सामने रख देते हैं। उनका मकसद होता है डिजाइनर बेबी।

क्या होता है डिजाइनर बच्चा?

डिजाइनर बेबी वह बच्चा होता है जिसके जीन्स में बदलाव किए जाते हैं। इसे जीन्स का मेकअप भी कहा जा सकता है। कपल्स की डिमांड के मुताबिक बच्चे को आंखों, बालों का रंग, लंबाई, स्किन कलर और गुण दिए जाते हैं। यह काम वाइट्रो फर्टिलाइजेशन यानी आईवीएफ तकनीक के जरिए किया जाता है। हालांकि कई देशों में यह काम गैरकानूनी है।

25 जुलाई 1978 को पहली टेस्ट ट्यूब बेबी लुइस ब्राउन पैदा हुईं। इसके बाद से इस दिन को वर्ल्ड आईवीएफ डे के रूप में मनाया जाता है।

25 जुलाई 1978 को पहली टेस्ट ट्यूब बेबी लुइस ब्राउन पैदा हुईं। इसके बाद से इस दिन को वर्ल्ड आईवीएफ डे के रूप में मनाया जाता है।

रुपए लगा ही रहे हैं तो मन मुताबिक बच्चा चाहिए

नोएडा स्थित जीवा क्लिनिक में आईवीएफ स्पेशलिस्ट डॉक्टर श्वेता गोस्वामी ने बताया कि जब कपल्स बच्चे के लिए आते हैं तो इस तरह के कई सवाल पूछते हैं। उनके दिमाग में होता है कि जब आईवीएफ पर रुपए खर्च कर ही रहे हैं तो उन्हें मन मुताबिक ही बच्चा चाहिए। वह विदेशों के उदाहरण देते हैं लेकिन भारत में आईवीएफ टेक्नोलॉजी इतनी एडवांस नहीं हुई है और यह लीगल भी नहीं। आईवीएफ की सांइस का मकसद हेल्दी बेबी पैदा करना है। हमें यह बात लोगों को समझानी पड़ती है। साइंस इतनी डिवेलप नहीं हुई है कि गर्भ में बच्चे की आंखों का रंग, त्वचा का रंग या हाइट पता कर सके।

विदेशी डोनर हो तो रंग गोरा होना संभव

डॉक्टर श्वेता गोस्वामी के अनुसार भारतीय कपल्स की सबसे ज्यादा डिमांड होती है बच्चे का गोरा रंग और लंबी हाइट। भले ही कपल खुद ऐसा न हो। कुछ लोग यूरोप के देशों के डोनर चाहते हैं ताकि बच्चे के गोरे रंग या नीली-हरी आंखें होने की संभावना बढ़ जाए। अगर डोनर विदेशी है तब डिजाइनर बेबी किया जा सकता है।

जॉर्जिया, रूस जैसे देशों के भी डोनर भारतीय चाहते हैं। अगर क्लाइंट ही विदेशी हो तो वह अपने जैसे ही रंग-रूप के डोनर चाहता है। यह प्रक्रिया बहुत महंगी है। इसमें 2-10 लाख रुपए खर्च होते हैं।

लेकिन डॉक्टर होने के नाते हम डिजाइनर बेबी को प्रोत्साहित नहीं करते। कपल्स को समझाना पड़ता है कि बच्चा होना ही बहुत बड़ी बात है। आप बच्चा पैदा करने के लिए आए हैं, मॉल में शॉपिंग करने नहीं आए।

भारत, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जर्मनी और स्विटजरलैंड समेत 40 देशों में इनहैबिटेबल जेनेटिक मॉडिफिकेशन (IGM) तकनीक बैन है। इसी से डिजाइनर बेबी बनाया जाता है।

भारत, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जर्मनी और स्विटजरलैंड समेत 40 देशों में इनहैबिटेबल जेनेटिक मॉडिफिकेशन (IGM) तकनीक बैन है। इसी से डिजाइनर बेबी बनाया जाता है।

बच्चे के गुण, रंग-रूप और ब्लड ग्रुप जीन्स पर निर्भर

बच्चे की लुक एग-स्पर्म पर निर्भर करती है। उसके गुण और ब्लड ग्रुप जीन्स पर लेकिन आईक्यू उसकी परवरिश और आसपास के माहौल पर निर्भर करती है। शरीर में कुछ जीन्स डोमिनेंट होते हैं जैसे लंबाई। बच्चे की लंबाई परिवार के सदस्यों की हाइट की तरह उभरती है। वहीं, आंखों का रंग रिसेसिव जीन कहलाता है। आंखों का रंग हरा, काला, भूरा, नीला तभी होगा जब बच्चे के मम्मी-पापा या दादी-दादा की आंखों का रंग ऐसा हो।

डोनर कौन है, गुप्त रखा जाता है

भारत में एआरटी बैंक (एसिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी क्लिनिक) से स्पर्म और एग आते हैं। जो डोनर होते हैं उनकी पहचान गुप्त रखी जाती है। पुरुषों के लिए स्पर्म डोनर बनना आसान है लेकिन महिलाओं को एग डोनर बनने के लिए पूरी आईवीएफ प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। यह सर्जरी ही होती है। ऐसे में पढ़े-लिखे लोग डोनर बनने के लिए आगे नहीं आते।

अधिकतर डोनर पैसों की जरूरत को पूरा करने के लिए ऐसा करते हैं। ऐसे में उम्मीद नहीं की जा सकती है डोनर हाई फाई हो। डॉक्टर को भी नहीं पता होता कि एग या स्पर्म किसके हैं इसलिए कपल्स को चॉइंस नहीं दी जाती।

इंडियन मेडिकल काउंसिल ऑफ रिसर्च की गाइडलाइंस के अनुसार डोनर की उम्र 21 से 40 साल के बीच होनी चाहिए।

इंडियन मेडिकल काउंसिल ऑफ रिसर्च की गाइडलाइंस के अनुसार डोनर की उम्र 21 से 40 साल के बीच होनी चाहिए।

दुनिया के पहले मॉडिफाइड जुड़वा बच्चे चीन में हुए पैदा

नवंबर 2018 में चीन में लूलू और नाना नाम की जुड़वां लड़कियां पैदा हुईं। उनके जीन्स में बदलाव किए गए थे। उन्हें पहला जेनेटिकली मॉडिफाइड बेबी कहा गया। जीन्स में यह बदलाव चीनी वैज्ञानिक हे जियानकुई ने किया। इसके बाद पूरी दुनिया में बहस छिड़ गई थी।

लेकिन दुनिया का पहला डिजाइनर बेबी एडम नैश को भी बताया जाता है। वह अमेरिका में साल 2000 में पैदा हुए। उसके मम्मी-पापा ने ऐसा बेबी डिजाइन किया जो कि फैंकोनी एनीमिया से ग्रस्त न हो। दरअसल दंपती की बड़ी बेटी को यह बीमारी थी। नैश ने अपनी बहन को बचाने के लिए अपने स्टेम सेल डोनेट किए थे।

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